गुरुवार, 15 जुलाई 2004

प्रदूषित आस्थाएँ

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प्रायः सभी मीडिया में आपने पाया होगा कि सावन के महीने में कॉवड़िए दूर दूर से
गंगा नदी पर आते हैं और उसका का जल लेकर अपने आराध्य देव शंकर को अर्पित करते
हैं. विश्व भर में इतने प्रकार की धार्मिक आस्थाएँ हैं कि वे किसी एक के लिए
विश्वास का प्रतीक हो सकती हैं, तो दूसरे के लिए उपहास का सबब. बहरहाल, इस आस्था
पर प्रहसन करने का आशय मेरा नहीं है, परंतु इससे होने वाले प्रदूषण अवश्य ही
सबके लिए चिंता का विषय हो सकते हैं.

कॉवड़िए अपनी भिन्न आस्थाओं के अनुसार गंगा का जल अपने कॉवड़ में भरते तो हैं,
परंतु इसके साथ ही वे गंगा में अपने वस्त्र, पत्र-पुष्प, दीप इत्यादि का भी
प्रवहन करते हैं. एक अनुमान के अनुसार अकेले हरिद्वार में ही ५० से ६० लाख
कॉवड़िए इस वर्ष पहुँच रहे हैं, जबकि उत्तर भारत के अन्य पर्वतीय स्थानों मसलन
गंगोत्री इत्यादि में पहुँचने वाले कॉवड़ियों की संख्या इसके अतिरिक्त है.
ज़ाहिर है कि राम की गंगा को तो दिन प्रतिदिन और भी अधिक मैली होनी ही है!
संपूर्ण भारत से इन कॉवड़ियों के एक साथ ही हरिद्वार पहुँचने के कारण कई
राजमार्गों को आम जनता के लिए कई अवसरों पर बन्द भी कर दिया जाता है.

ऊपर से आस्थाओं का परिष्करण करने के बजाए उसे और भी प्रदूषित करने का भीषण
अक्षम्य कार्य ज़ारी है. अब कॉवड़िए अपने कॉवड़ को रंग बिरंगे प्लास्टिक की
पन्नियों और पुष्पों से आच्छादित कर रहे हैं जो किसी भी दृष्टि से ईश्वर को
ग्राह्य नहीं होगा, पर अंधश्रद्धा की कोई सीमा है भी भला?

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ग़ज़ल

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मैं अपनी आस्थाएँ लिए रह गया
जंग ज़ारी थी मैं बैठा रह गया

आवरण तोड़ना तो था पर क्यों
लोग चल दिए मैं पीछे रह गया

करना था बहुत कुछ नया नया
भीड़ में मैं भी सोचता रह गया

ख़ुदा ने तो दी थी बुद्धि बख़ूब
क्यों औरों की टीपता रह गया

इस तक़नीकी ज़माने में रवि
पुराणपंथी बना देखो रह गया

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1 टिप्पणियाँ./ अपनी प्रतिक्रिया लिखें:

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