शुक्रवार, 9 जुलाई 2004

ये देश भोजनशाला बन गया...

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नए केंद्रीय बज़ट में सभी टेक्सपेयर्स को आयकर में २% सरचार्ज देना होगा, जो जन
शिक्षण कार्यक्रमों में खर्च किया जाएगा. परन्तु सरकार की योजनाएँ क्या वास्तव
में उपयोगी सिद्ध हो पाएँगी? कुछ राज्यों में अभी स्कूलों में मध्याह्न भोजन की
योजना चल रही है. वहाँ प्रायोगिक स्थिति यह है कि शिक्षक का प्राथमिक दायित्व
पाठ पढ़ाने का न होकर अब विद्यार्थियों को भोजन बनाना और परोसना रह गया है. वह
नित्य प्रति इस चिंता में रहता है कि सरकार की योजना अनुसार कल विद्यार्थियों को
भोजन कैसे परोसेगा. उसे कम खर्चों में मिर्च मसाले, सब्जी रोटी से लेकर लकड़ी
कंडे सब की फ़िक्र लगी हुई होती है. दोपहर का भोजन सैकड़ों विद्यार्थियों को
परोसने के लिए उसे सुबह से व्यवस्थाओं में लगा होना होता है और जब तक अंतिम
विद्यार्थी भोजन कर चुका होता है, संध्या होने लगती है.
इसी प्रकार बहुसंख्य विद्यार्थी शाला में अपने बस्ते में किताब कापियों के बजाए
सिर्फ थाली कटोरी लेकर
आते हैं. व्यवस्था का आलम यह है कि विद्यार्थियों को भोजन तो जैसे तैसे शिक्षकों
की कृपा से मिल जाता है, उन्हें अपनी सरकारी नौकरी जो निभानी है, पीने के पानी
के लिए कहीं कहीं कोई व्यवस्था नहीं है. कहीं शासकीय धन का दुरूपयोग भी हो रहा
है जहाँ घटिया क्वालिटी की चीजों से लेकर विद्यार्थियों की गलत संख्या बताकर
खर्चों के हिसाब बैठाए जाते हैं
कुल मिलाकर, सरकारी अदूरदर्शी योजनाओं के कारण अब पाठशाला पाठशाला नहीं रह कर
भोजनशाला बन कर रह गए हैं. पाठशाला की ही बातें क्यों करें, यह पूरा भारत देश
भ्रष्ट राजनेताओं और भ्रष्ट सरकारी बाबुओं का भोजनशाला बन गया है...
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ग़ज़ल
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भोजनशाला बन गया

कुछ कमी थी कि पाठशाला भोजनशाला बन गया
आख़िर क्योंकर यह मुल्क भोजनशाला बन गया

कहीं अमीरी और कहीं ग़रीबी की बातों के बीच
अदूरदर्शी योजनाओं का भोजनशाला बन गया

इसमें देश की जनता का है क्या कोई कसूर
जो देश राजनेताओं का भोजनशाला बन गया

क्या पता कभी किसी को फ़र्क पड़ेगा कि नहीं
व्यवस्थाओं के बदले वहाँ भोजनशाला बन गया

इनकी भूख का कोई इलाज़ क्यो नहीं है रवि
भोजनशालाओं में एक और भोजनशाला बन गया

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