टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

July 2004

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मैंने अपने पिछले दो-एक ब्लॉग में स्कूलों में दोपहर के भोजन की योजनाओं की प्रायोगिकता पर प्रश्नचिह्न खड़े किए थे. हादसों की एक और कड़ी में नई कड़ी जुड़ी है कि छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले के सरायपाली में दोपहर के भोजन में शराबी शिक्षकों ने छात्रों को भी शराब परोसा. एक ख़बर यह भी थी कि किसी स्कूल के छात्रों को पतली दाल और रोटियों को रोज खाकर ऊब होने लगी और उन्होंने यह भोजन करने से मना कर दिया.
देखें कि इस अप्रायोगिक योजना में आगे और भी क्या क्या हादसे होते हैं...
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सरकारें बड़े मज़े से अपनी सहूलियतों के लिए और अपने नाकारापन को ढँकने के लिए जब मर्जी आए, न्यायालयों का सहारा लेती रही हैं, और जब मर्जी पड़े न्यायालयों के आदेश के विरूद्ध अध्यादेश निकालती रही हैं. उदाहरणार्थ शाहबानो प्रकरण में न्यायालय के आदेश के विरूद्ध अध्यादेश लाया गया, तो पंजाब के सतलज-यमुना-लिंक नहर के लिए न्यायालय के आदेश के बावजूद उसे नहीं मानने के पंजाब विधानसभा के प्रस्ताव के परिप्रेक्ष्य में केंद्र सरकार किसी कठोर निर्णय लेने के बजाए फ़िर से न्यायालय का दरवाज़ा खटखटा रही है. न्यायालय भले ही आज लोगों के लिए एक्टिविज़्म का पर्याय लग रही हों, पर यह भी सत्य है कि निच़ली अदालतें पूरी तरह से भ्रष्टाचार का अड्डा बनी हुई हैं. गुज़रात के किसी अदालत ने तो भारत के राष्ट्रपति के नाम से गिरफ़्तारी वारंट भी ज़ारी कर दिया गया था. शिबू सोरेन के विरूद्ध प्रकरण अदालत में सन् १९७५ से चल रहा है, जिसके लिए अभी उन्हें गिरफ़्तारी वारंट जारी किया गया. ३० वर्षों में किसी एक प्रकरण का फ़ैसला नहीं हो पाना न्याय-तंत्र का मज़ाक नहीं तो और क्या है.

--- पर हमें क्या फ़र्क़ पड़ता है? पड़ता है क्या? अगर हमारे विरूद्ध कोई प्रकरण बने जिसमें हमें कोई सज़ा की गुंज़ाइश हो, तो हम भी यही करेंगे कि वकीलों को उनकी फ़ीस देकर सुनवाई की तिथियाँ आगे बढ़ाते रहेंगे. इस बीच राजनीति में घुसकर अपना वज़ूद बना लेंगे और हर संभव यह कोशिश करेंगे कि लोक हित में उस प्रकरण को वापस ले लिया जाए. यह भी संभव न हो तो पच्चीस तीस साल तो निकाल ही लेंगे, और भूले भटके अगर ज़ेल हो ही गई तो ज़ेल के बजाए अस्पताल का बिस्तर तो है ही जहाँ अपना डमी ठहरेगा और हम घूम घूमकर राजनीति किया करेंगे...

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ग़ज़ल
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क्या यह न्याय है?
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ज़ुर्म तेरी सज़ा मेरी क्या यह न्याय है
दशकों बाद मिले तो क्या यह न्याय है

तहरीर आपकी और फ़ैसला भी आपका
सुना तो रहे हो पर क्या यह न्याय है

तूने अपने लिए गढ़ ली राह गुलों की
काँटों पर हम चलें क्या यह न्याय है

सुनी थीं उनकी तमाम तहरीरें दलीलें
फ़ैसले पे सब हँसे क्या यह न्याय है

मत डूबो रवि अपनी जीत के जश्न में
सब कहते फ़िर रहे क्या यह न्याय है

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कुंभकोणम की हृदय विदारक घटना की आग अभी बुझ भी नहीं पाई थी कि मुम्बई के साकीनाका बीएमसी स्कूल में बच्चों के भोजन में कीड़ों के पाए जाने की घटना सनडे टाइम्स ऑफ़ इन्डिया ने अपने १८ ज़ुलाई के अंक में दी है. ऊपर से भोजन का परीक्षण किए जाने पर यह पाया गया कि वह विषाक्त है, और खाने योग्य नहीं है. यह तो भला हुआ कि उस भोजन के कारण कोई हादसा नहीं हुआ, वरना इस योजना में एक और धब्बा लग जाता.

शायद इन्हीं बातों के मद्देनज़र महाराष्ट्र में अब दोपहर के भोजन के बजाए मीठा दूध देने की योजना घोषित की गई है. दोपहर के भोजन की योजना भी ग़लत नहीं थी, परन्तु उसे अत्यंत अप्रायोगिक तरीके से लागू किया गया है जिसके कारण ही समस्याएँ आ रही हैं. अब देखना यह होगा कि दूध सिंथेटिक तो नहीं दिया जा रहा है (यू.पी. के कई शहरों में सिंथेटिक दूध धड़ल्ले से बिक रहा है, जिसमें यूरिया और डिटरज़ेंट जैसे ख़तरनाक रासायनिक पदार्थ होते हैं) या फ़िर नन्हें मुन्नों के दूध की मिठास शक्कर की है या सेकरीन की? अगर ऐसी योजनाओं को सफ़ल और प्रायोगिक बनाना है, तो अमूल जैसी बड़ी, व्यावसायिक सहकारी समितियों को पूर्ण एकाउन्टीबिलिटी सहित ये ज़िम्मेदारी दी जानी चाहिए, और शिक्षकों को उनके मूल कार्य - शिक्षण की जवाबदारी ही दी जानी चाहिए, न कि भोजन तैयार करने-परोसने की.

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आंध्र प्रदेश की सरकार द्वारा जारी एक अध्यादेश के तहत धर्म के आधार पर लागू आरक्षण को उच्च न्यायालय ने हाल-फ़िलहाल रोक लगा दी है. दशक पूर्व मंडल सिफ़ारिशें लागू कर वीपी सिंह आरक्षण मसले का जो राजनीतिकरण किया वह तेज़ी से ज़ारी है. पासवान जैसे लोग निजी क्षेत्र में भी आरक्षण की ज़ोरदार वकालतें करते रहते हैं. भारत की आज़ादी के ५० वर्ष बाद स्थिति यह है कि आरक्षण का आंकड़ा ५० प्रतिशत को पार कर गया. आधी सदी बीत जाने के बाद भी अगर सामाजिक परिस्थितियों में बदलाव नहीं आया, तो इसके पीछे अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंकने और अपने तात्कालिक राजनीतिक लाभ के लिए बनीं ये योजनाएँ ही हैं जो कभी भी देश का भला नहीं कर पाएँगीं. बाला साहेब ठाकरे ने अपने दल के ऊर्जा मंत्री अनंत गीते, जो कि देश के लिए प्रतिबद्ध होकर ऊर्जा की योजनाएँ बना रहे थे, कहा भी था- देश के लिए नहीं, पार्टी के लिए योजनाएँ बनाओ. कल को पार्टी नहीं रही तो तुम कहाँ रहोगे. इन्हीं भिन्नताओं के चलते अंततः प्रतिबद्ध गीते को मंत्री पद से स्तीफ़ा देना पड़ा था. ज़ाहिर है, मसला आरक्षण का हो या कोई और, अपने तात्कालिक राजनीतिक लाभ के लिए लिए गए ये फ़ैसले देश का भला करने के बजाए देश का खासा नुक़सान तो करेंगे ही, समाज में एकीकरण के बजाए उसे और भी ज्यादा बाँटने और उसमें दूरियाँ भरने का काम करेंगे.

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ग़ज़ल
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मेरा देश रिज़र्व हो गया
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देखते देखते मेरा देश रिज़र्व हो गया
जाना था फ़ारवर्ड पर रिज़र्व हो गया

देखे थे मैंने भी सपने हरे पीले नीले
टूट कर सब धूसर में रिज़र्व हो गया

नाउम्मीदी छोड़ने की किससे कहेंगे
अब तो सारा तंत्र ही रिज़र्व हो गया

वो क़ाफ़िर विधर्मी लंगोटिया था मेरा
अध्यादेश आते ही वो रिज़र्व हो गया

चल चलें किसी और ज़माने में रवि
जीने का हौसला यहाँ रिज़र्व हो गया

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आज़कल की कुछ मज़ेदार मीडिया सुर्ख़ियाँ-
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-- केंद्रीय मंत्री शिबू सोरेन को अदालत ने भगौड़ा घोषित किया , गिरफ़्तारी का वारंट ज़ारी किया, पुलिस बल को उनके नहीं मिलने पर अदालत के आदेश की तामील के सिलसिले में वह वारंट उनके घर पर चस्पा करना पड़ा.

-- शहाबुद्दीन (संसद सदस्य, जो जेल में रहकर चुनाव लड़े और जीते) को हाईकोर्ट के आदेश के तहत वापस जेल भेजा गया तथा फास्ट ट्रेक कोर्ट के उस जज को बर्खास्त किया गया जिसने शहाबुद्दीन को आनन फ़ानन में जमानत दी थी. पूरे प्रकरण की सीबीआई जाँच के आदेश दिए गए.

-- पप्पू यादव (विधान सभा सदस्य) को भी, जेल में रहने के बजाए जो अपनी बीमारियों के इलाज हेतु पटना अस्पताल में भर्ती थे से वापस अदालत द्वारा बेऊर जेल भेजा गया.

-- प्रभुनाथ सिंह (संसद सदस्य) के लिए हत्या जैसे ज़ुर्म के सिलसिले में गिरफ़्तारी का वारंट जारी. उन्हें १० दिवस के भीतर आत्म समर्पण करने को कहा गया.

-- राजा भैया को यूपी में पुनः मंत्री बनाया गया जो पहले पोटा में बंद थे, जिनके घर से खतरनाक हथियार बरामद हुए थे, और जिनके विरूद्ध ३० से ज़्यादा प्रकरण अदालत में चल रहे हैं.

उक्त सुर्ख़ियाँ उत्तर भारत की हैं. शुक्र है, दक्षिण से ऐसी सुर्ख़ियाँ नहीं आतीं. दरअसल, इन सब के पीछे गहरा कारण रहा है. जनसंख्या घनत्व यूपी, बिहार में सर्वाधिक है. रिसोर्सेज़ कम हैं, और इनका न्यायसंगत वितरण तो असंभव है. लिहाज़ा अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए लोगों को हर प्रकार के अराजक कार्यों में लिप्त होना पड़ता ही है. मुझे याद है कि बीसेक साल पहले म.प्र. और बिहार के बार्डर रामानुजगंज में जहाँ रहता था, वहां इन दोनों राज्यों में कितनी ज़मीन आसमान की भिन्नताएँ थीं, जो बढ़ती ही गईं. उदाहरण के लिए, जो यात्री बसें दोनों राज्यों के बीच चलती थीं, उनमें म.प्र. के क्षेत्र में सभी यात्री गण बस के भीतर बैठते थे. पर जैसे ही बिहार की सीमा आती थी, समस्त पुरूष यात्री बस की छत पर बैठ जाते थे और कहते थे कि बस के भीतर तो वृद्ध-बीमार पुरूष, स्त्रियाँ और बच्चे बैठते हैं. उस समय म.प्र. में पूरे समय बिजली रहती थी, और बिहार में यदा कदा. बिहार में बिजली के ट्रांसफ़ार्मरों को डीपी पर वेल्ड कर लगाया जाता था नहीं तो चोर उसे तोड़ कर उसकी वाइंडिग के तांबे को निकाल कर बेच (लाखों रूपए का ट्रांसफ़ार्मर खराब कर मात्र कुछ रूपयों में) देते थे! उस दौरान कहावतें थीं कि बिहार का हर पैसे वाला घर अपनी सुरक्षा के लिए एक लठैत पाल रखता है.

पर, हम अब भी बढ़ते जनसंख्या घनत्व के कारण तेज़ी से बढ़ती अराज़कता की ओर आंखें मूंदे हुए हैं. भूखे व्यक्ति को कहीं से कुछ खाने को मिलेगा नहीं तो वह आत्म हत्या करेगा (आंध्र के किसान) या अपराध के सहारे अपनी रोटी का जुगाड़ करेगा.
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ग़ज़ल
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क्या मज़ाक है
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देश और समाज को देखूं क्या मज़ाक है
दो वक्त़ की रोटी नहीं ये कोई मज़ाक है

हौसले ले के तो पैदा हुआ था बहुत मगर
खड़े होने को जगह नहीं कैसा मज़ाक है

तमन्ना तो रही थी तुलसी कब़ीर बनने की
दाऊद, राजन जमाने का भीषण मज़ाक है

शाम से भूखे और सुबह आपका ये दावा
लाओगे कुल्हड़ में तूफ़ान बढ़िया मज़ाक है

असम, बिहार में बाढ़ और दिल्ली में गरमी
कभी तो बदले सिलसिला अच्छा मज़ाक है

देखे है रवि अपने भविष्य के सुनहरे सपने
लगता है किया किसी ने तुच्छ मज़ाक है

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सॉफ़्टवेय़र समीक्षाः
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ऑर्ट-रेज़् (ArtRage): सुंदर रीयलिस्टिक कलाकृतियाँ सृजित करने का उच्चकोटि का मुक्त औज़ार
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दोस्तों, मैंने  अब तक बहुत सारे सॉफ़्टवेय़र देखे और जाँचें हैं,  जो कि कम्प्यूटर पर पेंटिग की कलाकृतियाँ बनाने के काम आते हैं. एडोब फ़ोटोशॉप से लेकर पेंटशॉप प्रो तक तथा विंडोज़ के सामान्य पेंट प्रोग्राम से लेकर लिनक्स के ग़िम्प तक. कभी कोई अच्छा लगा तो कभी कोई. किसी की कुछ ख़ूबियाँ पसन्द आईं  तो किसी की कुछ. पर अगर सिर्फ ठेठ कलाकृतियाँ बनाने का ही काम हो, वह भी किसी ठेठ कैनवस पर, तो आपको तो कम्प्यूटर टर्मिनल को छोड़कर वास्तविक पेंट, ब्रश और कैनवस की शरण में जाना ही  होगा.
पर शायद मैं ग़लत था. लगता है कम्प्यूटर प्रोग्रामर सभी असंभव चीज़ों को  संभव बनाने में जुटे हुए हैं. जब मैंने आर्ट-रेज़् नामक एक मुफ़्त पेंट प्रोग्राम को चलाकर देखा, तो लगा कि मेरे कम्प्यूटर स्क्रीन पर तो साक्षात कैनवस का अवतरण हो गया है. अगर आपको यक़ीन न हो तो, हाथ कंगन को आरसी क्या? इस प्रोग्राम के वेब साइट http://www.ambientdesign.com पर जाइए, यह मुफ़्त प्रोग्राम डाउनलोड करिए, और इसे अपने विंडोज़ में संस्थापित करिए और अपने माउस की सहायता से इस प्रोग्राम का एकाध ब्रुश चलाकर देखिए.
इस प्रोग्राम की और भी ख़ूबियाँ हैं, उदाहरण के लिएः इसमें कलाकृति तैयार करने के लिए आप कई तरह के कैनवस का चुनाव कर सकते हैं. कलाकृति बनाने के तमाम औज़ार मसलन पेंसिल, क्रेयान, चाक, आयल पेंट ब्रश, जल रंग ब्रश, फ़ेल्ट पेन तथा पैलेट नाइफ़ तक इसमें मौज़ूद हैं, और स्क्रीन पर असली काम का सा आभास देते हैं. इसमें आपको ट्रेसिंग पेपर लोड करने की भी सुविधा दी गई है, जिसके द्वारा आप पृष्ठ-भूमि में कोई छवि लोड कर उसकी अनुकृति तैयार कर सकते हैं. यहाँ  मज़ेदार बात यह है कि अनुकृति के अनुसार आपके पेंट के हाथ स्वचालित चलते हैं, और मेरे जैसा नौसिख़िया भी पिकॉसो की तरह पेंटिंग देखते देखते तैयार कर सकता है.
यह प्रोग्राम अपने द्वारा बनाए गए पेंटिंग्स को एक नए फ़ॉर्मेंट *.ptg में सहेजता है जो कि इसके कार्य के अनुरूप है. हालाकि आप इसे अन्य फ़ॉर्मेंट में निर्यात भी कर सकते हैं. इसके साथ एक बड़ी खामी यह है कि यह वर्तमान में सिर्फ विंडोज़ वातावरण हेतु उपलब्ध है, परंतु वर्चुअल मशीन्स तथा वाइन इत्यादि के सहयोग से लिनक्स में भी आराम से चल सकेगा ऐसा प्रतीत होता है, चूंकि  यह अत्यंत छोटा सा औज़ार है, जो बहुत छोटी लाइब्रेरी का उपयोग करता है.
इसका चित्रमय वातावरण भी अत्यंत आसान और बिल्कुल नए तरह का है, जो आपको कंप्यूटर के इत़र किसी नई दुनिया में होने का आभास देता है.

राजेन्द्र यादव ने हंस, जुलाई २००४ के संपादकीय में बड़े ही मज़ेदार तरीक़े से, चुटकियाँ लेते हुए, हिंदी साहित्य संसार के प्रायः सभी नए-पुराने समकालीन लेखकों/कवियों के बारे में टिप्पणियाँ की है कि किस प्रकार लोग अपनी छपास की पीड़ा को तमाम तरह के हथकंडों से कम करने की नाकाम कोशिशों में लगे रहते हैं. अगर यादव जी हंस के संपादन के इस तरह के अनुभवों को पहले प्रकाशित करते तो बहुतों का भला हो जाता और वे हंस की ओर अपने छपास की आस लगाए नहीं फ़िरते. बहरहाल, धन्यवाद राजेन्द्र यादव जी. वैसे भी हिंदी साहित्य अब राइटर्स मार्केट बन गया है. रीडर्स मार्केट भले ही कभी रहा हो, पर अब, लेखक हैं हज़ार तो पाठक हैं एकाध (स्वयं अपनी रचना का पाठ कर खुश होने वाले -- इनमें सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन भी रहे हैं, जो नदियों को कविता सुनाते थे)

ऐसी स्थिति में, छपास पीड़ा हरण के लिए इंटरनेट के व्यक्तिग़त पृष्ठ और ब्लॉग से बढ़कर भला और क्या हो सकता है? यहाँ पर आकर आप मुफ़्त में अपनी बकवास आराम के साथ, मज़े में, दिन प्रति दिन , साल दर साल लिख कर छाप सकते हैं, और यह भी उम्मीद कर सकते हैं कि आपके लिखे गए पन्ने किसी एक रूपए के ग़र्म भजिए के पुड़िए में बांधा नहीं जाएगा और भजिया खाकर ऊंगली पोंछकर कूड़ेदान (यहाँ भारत में कोई कूड़ेदान का उपयोग करता है क्या? और करता भी है, तो कितने कूड़ेदान हैं? हमारे लिए तो सड़कें, प्लेटफॉर्म इत्यादि कूड़ेदान के बेहतरीन सब्स्टीट्यूट हैं) में फ़ेंका नहीं जाएगा.

मैं भी छपास की अपनी थोड़ी सी पीड़ा हरण करने का प्रयास निम्न ग़ज़ल के साथ करता हूँ. मुलाहिज़ा फ़रमाएँ:
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ग़ज़ल
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सब सुनाने में लगे हैं अपनी अपनी ग़ज़ल
क्यों कोई सुनता नहीं मेरी अपनी ग़ज़ल

रंग रंग़ीली दुनिया में कोई ये बताए हमें
रंग सियाह में क्यों पुती है अपनी ग़ज़ल

छिल जाएंगी उँगलियाँ और फूट जाएंगे माथे
इस बेदर्द दुनिया में मत कह अपनी ग़ज़ल

मज़ाहिया नज़्मों का ये दौर नया है यारो
कोई पूछता नहीं आँसुओं भरी अपनी ग़ज़ल

जो मालूम है लोग ठठ्ठा करेंगे ही हर हाल
मूर्ख रवि फ़िर भी कहता है अपनी ग़ज़ल

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बिकाज़ आर व़ी डूम्ड फ़ॉर इट?
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मैंने अपनी किसी पिछली पोस्टिंग में लिखा था कि भारत में पाठशालाओं को अप्रायोगिक तरीके से भोजनशालाओं में तब्द़ील कर दिया गया है. तमिलनाडु के तंजावुर जिले के कुंभकोणम में एक पाठशाला में दोपहर का भोजन पकाते वक्त़ फ़ैली आग ने ८१ बच्चों को ज़िंदा जला कर मार डाला. मेरे ही रतलाम जिले के किसी गांव में स्कूली बच्चों द्वारा दोपहर के भोजन का बहिष्कार इस लिए किया गया कि वह किसी दलित महिला द्वारा तैयार किया गया था. कुछ समय बाद शायद हमें यह ख़बर मिले कि दोपहर का भोजन खाकर फ़ूड पॉयज़निंग से कुछ विद्यार्थियों की मौत हो गई, या कहीं कोई साम्प्रदायिक विवाद पैदा हो गया.
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इंडियन एक्सप्रेस ने अपने १३ ज़ुलाई के संपादकीय में लिखा है कि टूरिज़्म मंत्री रेणुका चौधरी ने रक्षा मंत्री को पत्र लिखा है कि १५५ मिमी हैवी आर्टिलरी गन का कोई एक विशिष्ट मॉडल अच्छा है, और उसे खरीदना चाहिए. वे अपनी सिफ़ारिश में यह भी जोड़ती हैं कि उन्हें इसका ज्ञान है, चूंकि वे एक पूर्व सेवा अफ़सर की बेटी हैं! अच्छा है, हमें अपने ज्ञान का उपयोग तो करना ही चाहिए! अब तो रक्षा मंत्रालय को चाहिए कि उन्हें अगर बोफ़ोर्स जैसे विवादों से बचना है, तो पूर्व-वर्तमान सेवा अफ़सरों के बेटों-बेटियों से सिफ़ारिशें प्राप्त कर तमाम रक्षा सौदों को अंजाम दें.
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रितु सरीन ने इंडियन एक्सप्रेस के १५ ज़ुलाई के अंक में यह चौंकाने वाली ख़बर दी है कि किस तरह पप्पू यादव अपने उच्च-रक्तचाप, पीठ दर्द और पैर में चोट इत्यादि बीमारियों के इलाज़ के लिए जेल से दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में भर्ती हुए और पूरे दो साल तक सिर्फ रात में अस्पताल में रहते थे, और दिन भर बाहर रह कर राजनीति करते थे. यहाँ तक कि चुनावों के दौरान वे मधेपुरा में प्रचार अभियानों में भी लगे रहे. दिन में उनका कोई डमी अस्पताल के बिस्तर पर रहता था!

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ग़ोधरा फ़िर उबाल पर है. बीज़ेपी अपने को बेदाग़ कहती है, पर किसी नई जाँच पर बवाल मचाती है. वह दाग़ी मंत्रियों पर संसद में हंगामा खड़ा करती है तो ज़ूदेव को राज्य सभा सदस्य से नवाज़ती है. सत्ता में रहकर एफ़डीए की पैरोकार, महज़ विरोध के नाम पर रीफॉर्म्स का विरोध कर रही है!

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ग़ज़ल

जहाँ लोग लगे हैं पूरियाँ त़लने में
क्या हर्ज़ है अपनी रोटी सेंकने में

मची है मुहल्ले में जम के मारकाट
हद है, और भीड़ लगी है देखने में

बातें ग़ज़ब हैं आगे चलने की पर
ज़ोर है सारा असली चेहरा छुपने में

भारत भाग्य क्या जाने विधाता जब
जनता को पड़ गई आदत सहने में

तू भी कर ही ले अपनी चिंता रवि
क्या रखा है इन पचड़ों में पड़ने में

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प्रायः सभी मीडिया में आपने पाया होगा कि सावन के महीने में कॉवड़िए दूर दूर से
गंगा नदी पर आते हैं और उसका का जल लेकर अपने आराध्य देव शंकर को अर्पित करते
हैं. विश्व भर में इतने प्रकार की धार्मिक आस्थाएँ हैं कि वे किसी एक के लिए
विश्वास का प्रतीक हो सकती हैं, तो दूसरे के लिए उपहास का सबब. बहरहाल, इस आस्था
पर प्रहसन करने का आशय मेरा नहीं है, परंतु इससे होने वाले प्रदूषण अवश्य ही
सबके लिए चिंता का विषय हो सकते हैं.

कॉवड़िए अपनी भिन्न आस्थाओं के अनुसार गंगा का जल अपने कॉवड़ में भरते तो हैं,
परंतु इसके साथ ही वे गंगा में अपने वस्त्र, पत्र-पुष्प, दीप इत्यादि का भी
प्रवहन करते हैं. एक अनुमान के अनुसार अकेले हरिद्वार में ही ५० से ६० लाख
कॉवड़िए इस वर्ष पहुँच रहे हैं, जबकि उत्तर भारत के अन्य पर्वतीय स्थानों मसलन
गंगोत्री इत्यादि में पहुँचने वाले कॉवड़ियों की संख्या इसके अतिरिक्त है.
ज़ाहिर है कि राम की गंगा को तो दिन प्रतिदिन और भी अधिक मैली होनी ही है!
संपूर्ण भारत से इन कॉवड़ियों के एक साथ ही हरिद्वार पहुँचने के कारण कई
राजमार्गों को आम जनता के लिए कई अवसरों पर बन्द भी कर दिया जाता है.

ऊपर से आस्थाओं का परिष्करण करने के बजाए उसे और भी प्रदूषित करने का भीषण
अक्षम्य कार्य ज़ारी है. अब कॉवड़िए अपने कॉवड़ को रंग बिरंगे प्लास्टिक की
पन्नियों और पुष्पों से आच्छादित कर रहे हैं जो किसी भी दृष्टि से ईश्वर को
ग्राह्य नहीं होगा, पर अंधश्रद्धा की कोई सीमा है भी भला?

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ग़ज़ल

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मैं अपनी आस्थाएँ लिए रह गया
जंग ज़ारी थी मैं बैठा रह गया

आवरण तोड़ना तो था पर क्यों
लोग चल दिए मैं पीछे रह गया

करना था बहुत कुछ नया नया
भीड़ में मैं भी सोचता रह गया

ख़ुदा ने तो दी थी बुद्धि बख़ूब
क्यों औरों की टीपता रह गया

इस तक़नीकी ज़माने में रवि
पुराणपंथी बना देखो रह गया

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भारत (और चीन की भी) की जनसंख्या के बारे में चौंकानी वाली बात एक और भी है.
लिंग परीक्षणों जैसी सुविधाओं का उपयोग करते हुए भारत के अधिसंख्य परिवारों ने
पारंपरिक मान्यताओं और रूढ़ियों के कारण बालिकाओं की जगह बालकों के जन्म को
हमेशा से प्राथमिकता दी है. लिहाजा पुरूष और स्त्री के जनसंख्या अनुपात में
अंतराल चिंताज़नक तेजी से बढ़ता जा रहा है. जहाँ भारत का राष्ट्रीय स्त्रीःपुरूष
औसत अनुपात पिछले दशक में १०५.८ से बढ़कर १०७.९ पहुँच गया वहीं कुछ राज्यों,
मसलन पंजाब में यह औसत अनुपात १२६ तक है.

अब, ऐसी स्थिति में लोगों को कौन यह समझाए कि भाई, आपने अपना वंश चलाने को
पुत्र तो पैदा कर लिया, पुत्र वधू कहाँ से लाओगे जो आपके पौत्र को जन्म दे सके?
अभी के अनुपात (पंजाब) के हिसाब से प्रत्येक १२६ पुरूषों में से जब २६ अविवाहित
रहने को अभिशप्त हो जाएँगे तो कल्पना कीजिए कि हालात क्या होने हैं?

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ग़ज़ल
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क्या कुछ सीख पाएंगे हम लोग
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क्या कभी कुछ सीख भी पाएंगे हम लोग
जमाने को सिर्फ सोच दे जाएंगे हम लोग

ज़ंगलों की आग में और भी हवाएँ दे रहे
लगता नहीं हरियाली रोप पाएंगे हम लोग

घर के पत्थर को तो कभी तराशा नहीं
दावा है कि कोहेऩूर ढूंढ लाएंगे हम लोग

अब तो उठ के बनाना होगा कोई मंज़िल
नहीं तो और भी पीछे हो जाएंगे हम लोग

फ़ेंक रवि अपनी फ़टी पुरानी चादर वरना
श़क है कि ज़हीनों में भी आएंगे हम लोग

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अंत में...

दशकों से सिगरेटों का धुआँ उड़ाते उड़ाते आईटीसी को अंततः कैंसर का रोग लग ही गया
लगता है, लिहाज़ा वह भी अब भगवान की शरण में जाकर अगरबत्ती का धुआँ उड़ाने जा
रही है... (जी हाँ, आईटीसी का मेड फॉर ईच अदर (विल्स सिगरेट) ब्रांड अब लगता है
कि किसी अगरबत्ती के विज्ञापन में देखने को मिलेगा क्योंकि अब वह अगरबत्ती का
निर्माण_विपणन करने जा रही है...)
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आज विश्व जनसंख्या दिवस है. मैंने अपनी पिछली किसी पोस्टिंग में इस बात का जिक्र
किया था कि भारत अपने असीमित संसाधनों के बावज़ूद कैसे बढ़ती जनसंख्या के सामने
पंगु और असहाय होकर संपूर्ण अराजकता की स्थिति में शीघ्र ही पँहुचने वाला है.
उदाहरण के लिए ही लें, तो रतलाम जिले की जनसंख्या पिछले दस वर्षों में २६% तक
बढ़ गई! जनसंख्या पर रोक प्रथम प्राथमिकता होनी चाहिए. जहाँ पढ़े लिखे मध्य उच्च
वर्ग में जनसंख्या वृद्धि पर रोक स्वैच्छिक हो रही है, बात दरअसल अनपढ़ ग़रीबों
की है जो अब भी यह समझते हैं कि घर में बच्चा पैदा होना ऊपर वाले ईशु, ईश्वर और
अल्लाह की देन है, और उस पर रोक लगाना बेमानी है. ऐसी स्थिति में चीन की तरह
जनसंख्या वृद्धि रोकने हेतु कड़े प्रतिबंध क़ानूनन लगाया जाना ज़रूरी है, और,
इसके अलावा क्या आपको लगता है कि भारत में कोई उपाय है भी?

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ग़ज़ल
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मेरा देश कहाँ जाएगा
भीड़ ले के मेरा देश कहाँ जाएगा
राह अपनी पकड़ वहाँ कहाँ जाएगा

कुछ तो ख़याल कर ले कल का
वरना परसों तू फ़िर कहाँ जाएगा

किसे चाह नहीं आबाद दुनिया पर
हर वक्त के मेले में कहाँ जाएगा

फ़िक्र कर वोटों के अलावा भी
तू तो गया तेरा पुत्र कहाँ जाएगा

सोचकर रवि होता है हलाकान
दहकता ये हादिसा कहाँ जाएगा

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एक अख़बार ने ख़बर छापी कि देश का दूसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान अमृता प्रीतम को
रजिस्टर्ड डाक से भेजा जाने वाला है चूंकि वे गंभीर अस्वस्थता के कारण वह सम्मान
लेने समारोह पर नहीं जा सकीं. ख़बर छपते ही हलचल मची तो पता चला कि यह तो देश के
क़ानून में है कि यदि कोई व्यक्ति नागरिक सम्मान लेने किसी कारण से नहीं पहुँच
पाता तो यह सम्मान उसे रजिस्टर्ड डाक से भेजा जाता है. वाह भई क्या बात हुई. यह
तो भारत राज में ही संभव है जहाँ एक पुरस्कार जो स्वयं राष्ट्रपति महोदय अपने
हाथों से देते हैं, यह कार्य डाक विभाग का पोस्टमेन भी निभाता है!
मुझे ध्यान है कि कुछ अरसा पहले जब सत्यजीत राय को ऑस्कर अवॉर्ड दिया गया था, तो
वे अपनी अस्वस्थता के चलते अवॉर्ड लेने नहीं जा सकते थे, तो आयोजकों ने यह
पुरस्कार उन तक पहुँचाया और उसका फ़ुटेज़ भी पुरस्कार वितरण के दौरान दिखाया.
क्या भारत में, जहाँ देश का सर्वोच्च सम्मान दिया जाता है, ऐसी व्यवस्था नहीं की
जा सकती? संभवतः नहीं. चूंकि किसी सरकारी बाबू ने यह नियम बना दिया है कि ऐसे
पुरस्कार तो रजिस्टर्ड डाक से भेजे जाने चाहिएँ, लिहाज़ा नियम तोड़ा थोड़े ही जा
सकता है.
पर, शुक्र है, अख़बार की ख़बर से सरकारी गलियारों में कुछ हलचल मची और कोई आला
अफ़सर स्वयं उपस्थित होकर अपने हाथों से वह पुरस्कार अमृता प्रीतम को प्रदान
किया. अब तो, शायद अखबार ही बचे हैं आपके भीतर की मानवता को निकाल बाहर करने के
लिए, वह भी, अगर कुछ असर करे, तो.

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ग़ज़ल
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बस, अख़बार बचे हैं
अब तो बस अख़बार बचे हैं
कुछ टहनी कुछ ख़ार बचे हैं

भीड़ भरे मेरे भारत में लो
मानव बस दो चार बचे हैं

कहने को क्या है जब सब
बेरोज़गार और बेकार बचे हैं

च़मन उजड़ चुका है बस
नेता के ग़ले के हार बचे हैं

चूस चुके इस देश को रवि
मुँह में फ़िर भी लार बचे हैं
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टीपः ख़ार = कांटे
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नए केंद्रीय बज़ट में सभी टेक्सपेयर्स को आयकर में २% सरचार्ज देना होगा, जो जन
शिक्षण कार्यक्रमों में खर्च किया जाएगा. परन्तु सरकार की योजनाएँ क्या वास्तव
में उपयोगी सिद्ध हो पाएँगी? कुछ राज्यों में अभी स्कूलों में मध्याह्न भोजन की
योजना चल रही है. वहाँ प्रायोगिक स्थिति यह है कि शिक्षक का प्राथमिक दायित्व
पाठ पढ़ाने का न होकर अब विद्यार्थियों को भोजन बनाना और परोसना रह गया है. वह
नित्य प्रति इस चिंता में रहता है कि सरकार की योजना अनुसार कल विद्यार्थियों को
भोजन कैसे परोसेगा. उसे कम खर्चों में मिर्च मसाले, सब्जी रोटी से लेकर लकड़ी
कंडे सब की फ़िक्र लगी हुई होती है. दोपहर का भोजन सैकड़ों विद्यार्थियों को
परोसने के लिए उसे सुबह से व्यवस्थाओं में लगा होना होता है और जब तक अंतिम
विद्यार्थी भोजन कर चुका होता है, संध्या होने लगती है.
इसी प्रकार बहुसंख्य विद्यार्थी शाला में अपने बस्ते में किताब कापियों के बजाए
सिर्फ थाली कटोरी लेकर
आते हैं. व्यवस्था का आलम यह है कि विद्यार्थियों को भोजन तो जैसे तैसे शिक्षकों
की कृपा से मिल जाता है, उन्हें अपनी सरकारी नौकरी जो निभानी है, पीने के पानी
के लिए कहीं कहीं कोई व्यवस्था नहीं है. कहीं शासकीय धन का दुरूपयोग भी हो रहा
है जहाँ घटिया क्वालिटी की चीजों से लेकर विद्यार्थियों की गलत संख्या बताकर
खर्चों के हिसाब बैठाए जाते हैं
कुल मिलाकर, सरकारी अदूरदर्शी योजनाओं के कारण अब पाठशाला पाठशाला नहीं रह कर
भोजनशाला बन कर रह गए हैं. पाठशाला की ही बातें क्यों करें, यह पूरा भारत देश
भ्रष्ट राजनेताओं और भ्रष्ट सरकारी बाबुओं का भोजनशाला बन गया है...
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ग़ज़ल
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भोजनशाला बन गया

कुछ कमी थी कि पाठशाला भोजनशाला बन गया
आख़िर क्योंकर यह मुल्क भोजनशाला बन गया

कहीं अमीरी और कहीं ग़रीबी की बातों के बीच
अदूरदर्शी योजनाओं का भोजनशाला बन गया

इसमें देश की जनता का है क्या कोई कसूर
जो देश राजनेताओं का भोजनशाला बन गया

क्या पता कभी किसी को फ़र्क पड़ेगा कि नहीं
व्यवस्थाओं के बदले वहाँ भोजनशाला बन गया

इनकी भूख का कोई इलाज़ क्यो नहीं है रवि
भोजनशालाओं में एक और भोजनशाला बन गया

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इकॉनामिस्ट स्वामीनाथन अय्यर ने रेल्वे बज़ट पर मज़ेदार टिप्पणी की. उन्होंने कहा
कि यह बज़ट देश के लिए नहीं है, वरन् लालू की कांस्टिट्यूएंसी के लिए है. आगे
उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी श्रेणियों में किराया नहीं बढ़ा तो इसमें
प्रसन्नता की कोई बात इस लिए नहीं है, चूंकि बज़ट देश के लिए नहीं है, वरन् कुछ
वोट बैंक पक्का करने के लिए है. लिहाजा रेल सेवाएँ कम खर्चे पर, सस्ती ही होनी
चाहिएँ भले ही वे घटिया हों. घटिया, सड़ा गला, बेकार सब चलेगा, शर्त ये है कि वे
सस्ती होनी चाहिएँ.

सचमुच, रेल सेवा कितनी सस्ती हैः एक उदाहरणः रतलाम से इंदौर (१००कि.मी.) का रेल
किराया है १९ रूपए, जबकि वहीं रेल्वे स्टेशन से कहीं भी बाहर जाने का
थ्री_व्हीलर का न्यूनतम किराया है २० रूपए. ज़ाहिर है, भारतीय रेल की तुलना
जापानी, फ्रांसीसी या चीनी रेल से नहीं की जा सकती. हमें तो, घटिया चलेगा,
बशर्तें उन्हें सस्ता होना चाहिए. इन्हीं भावों को उद्वेलित करती एक ग़ज़ल
पढ़िएः

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ग़ज़ल
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सस्ता होना चाहिए

घटिया बेकार चलेगा बशर्तें उन्हें सस्ता होना चाहिए
इस शहर में जीना है तो उन्हें सस्ता होना चाहिए

विचारधारा, प्रतिबद्धता, प्रगतिशीलता झोंको भाड़ में
जिन्हें सफ़ल होना है उन्हें सस्ता होना चाहिए

न करो इस जमाने में कर्म की कालातीत बातें
समझने समझाने के लिए उन्हें सस्ता होना चाहिए

सुकून भरे ख्वाबों के लिए तरसता रहा वो मुसाफ़िर
पता न था कि नींद में भी उन्हें सस्ता होना चाहिए

ढोरों गँवारों के शहर में तो ज़ाहिरा बात है दोस्तों
अगर कोई रास्ते बने भी हैं उन्हें सस्ता होना चाहिए

पुकारते हुए साँस उखड़ जाएगी रवि तेरी एक दिन
मुद्दे उठने के लिए भी अब उन्हें सस्ता होना चाहिए

*+*+*+*

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अरूण शौरी, जो कि भारत के मात्र कुछेक गिने चुने प्रतिबद्ध मंत्रियों में से रहे
हैं, ने इंडियन एक्सप्रेस के अपने पिछले अंक में ग्राफ़िक डिटेल में सिलसिलेवार
यह बताया है कि किस तरह भारत के कुछ राजनेता शासकीय निगमों और उपक्रमों की आड़
लेकर शासकीय हजारों करोड़ रूपयों का वारा न्यारा करते हैं, और कहीं कोई
एकाउन्टीबिलिटी नहीं होती.
मेरे ही शहर का एक ज्वलंत उदाहरण है. शहर के मेयर द्वारा सिटी सेंटर नाम का एक
व्यावसायिक परिसर नगर निगम के सहयोग से बनाया. परंतु विकास की यह सीढ़ी विरोधी
पार्टी के नेताओं को पसंद नहीं आई लिहाजा उसमें तमाम तरह के हथकंडे लगाए गए और
मामला न्यायालय से लेकर शासन तक खिंच रहा है. शासन का करोड़ों रूपया व्यर्थ ही
उस अध_बने, अनुपयोगी सिटी सेंटर में बर्बाद हो रहा है, पर कहीं किसी को कोई
चिंता नही. किसी की कोई एकाउंटिबिलिटी नहीं. यह तो मात्र एक उदाहरण है. ऐसे
सैकड़ों उदाहरण मिल जाएंगे. यहाँ तक कि आपके शहरों में भी दर्जनों उदाहरण मिल
जाएँगे. एक तरफ़ दिन प्रतिदिन करों में बढ़ोत्तरी कर आम जन से ज्यादा से ज्यादा
कर वसूला जा रहा है, वहीं दूसरी ओर इसी पैसे का दुरूपयोग तो दूर की बाद उपयोग ही
नहीं हो रहा है. एक राजनीतिक पार्टी अगर देश को आगे बढ़ाने कुछ योजना बनाती है,
तो दूसरी को उसमें सड़ांध नज़र आती है, और वे उसमें टंगड़ी मारते हैं. और हम
हैं, जहाँ के वहीं. विनोद धाम अमरीका जाकर एक्स८६ ऑर्किटेक्चर डिज़ाइन कर सकते
हैं, परंतु भारत में लाल फ़ीताशाही, राजनीति और इंस्पेक्टर राज के कारण क्या वे
यहाँ कुछ कर पाते? आपमें से कुछ को लग सकता है कि स्थिति उतनी बुरी भी नहीं है,
परंतु द्वितीय महायुद्ध में नेस्तनाबूद ज़ापान अगर अपनी सीमित रिसोर्सेज़ के साथ
पचास वर्षों में कहीं का कहीं पहुँच सकता है तो भारत घिसट क्यों रहा है अभी तक?
गंगा कावेरी मिलन क्या सपनों तक ही सीमित रहेगा? गोल्डन ट्राएंगल पचास साल बाद
शुरू हो रहा है, वह भी दुबे जैसे प्रतिबद्ध इंजीनियरों की कुर्बानियों से स्याह
क्यों हो रहा है?

***
ज़रूरत से ज्यादा चिंतन हो गया. प्रस्तुत है आज की ग़ज़लः

***
ग़ज़ल
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ज़रा देखिए

इस भारत का क्या हाल हो रहा ज़रा देखिए
नेता अफ़सर माला माल हो रहा ज़रा देखिए

दक्षिण सूखा, पश्चिम सूखा पूरब की क्या बात
उत्तर बाढ़ से बुरा हाल हो रहा ज़रा देखिए

जिसने सीटी बजाई, व्यवस्था की बातें की
होना क्या है, वह काल हो रहा ज़रा देखिए

कुरसी के खेल में तोड़ डाले सब नियम
ये देश तो मकड़ जाल हो रहा ज़रा देखिए

प्रगति, विकास के नारे, समाज़वाद साम्यवाद
ऐसा पाखंड सालों साल हो रहा ज़रा देखिए

सभी लगे हैं झोली अपनी जैसे भी भरने में
मूर्ख अकेला रवि लाल हो रहा ज़रा देखिए

****

और, आखिर में छोटी सी एक हँसीः
एक स्लिमिंग सेंटर (वंदना लूथ़रा नहीं) के उपचार के उपरांत एक संभ्रांत महिला
इतनी पतली हो गई कि जब उसे बाज़ू से देखा जाता था, तो उसके न होने का अहसास होता
था... हा... हा...हा...

+*+*+*

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भाई आलोक को उनकी टिप्पणी के लिए धन्यवाद. मुझे खुशी हुई कि आपको मेरी टूटी फूटी
(छत्तीसगढ़ी भाषा, जहाँ मेरा बचपन गुज़रा, में, उत्ता धुर्रा) ग़ज़ल पसंद आई.
****

पिछले दिनों चैनल सर्फिंग (पीसी पर नहीं) के दौरान महेश भट्ट की एक तीख़ी टिप्पणी
पर बरबस ध्यान चला गया. उन्होंने कहा थाः पिछड़ों और ग़रीबों के नाम से इस देश
में लोग काफ़ी धंधा कर रहे हैं, और उनका शोषण कर रहे हैं...

ग़रीब और पिछड़े हमेशा ही सियासत के बड़े वोट बैंक रहे हैं. जातिवाद ने भारत का
कबाड़ा कर दिया है. एलीट क्लास में जातिवाद, धर्मवाद तो समाप्त प्रायः है पर
ग़रीब और पिछड़े अपनी अशिक्षा के चलते उन्हीं जातिवाद और धर्मवाद में घुसे हैं
और सियासत उसमें ढेर सारा शुद्ध ऑक्सीज़न पहुँचा रही है ताकि यह आग उनकी छुद्र
भलाई के लिए ज़लती, और भड़कती रहे. अगर हम आने वाले कुछेक वर्षों का अंदाज़ा
लगाने की कोशिश करें तो पाते हैं कि स्थिति तो बनने के बज़ाए बिगड़नी ही है...
इन्हीं बातों को इंगित करती एक ग़ज़ल प्रस्तुत है...

****
ग़ज़ल
****
बन गए हैं ग़रीब
****
राजनीति के स्तंभ बन गए हैं ग़रीब
अब तो मुद्दे स्थाई बन गए हैं ग़रीब

सियासी खेल का कोई राज बताए
कि धनवान क्यों बन गए हैं ग़रीब

चान्दी का चम्मच ले पैदा हुए हैं जो
वो और भी ज्य़ादा बन गए हैं ग़रीब

सोने की चिड़िया का हाल है नया
क़ौम के सारे लोग बन गए हैं ग़रीब

अपनी अमीरी दुनिया सबने बना ली
औरों की सोचने में बन गए हैं ग़रीब

कुछ कर रवि, कि फोड़ अकेला भाड़
वरना तो यहाँ सब बन गए हैं ग़रीब


****
भाई अतुल अरोरा को उनकी टिप्पणी हेतु हार्दिक धन्यवाद.
रतलाम (मध्य प्रदेश) जहाँ मैं अभी रहता हूँ, वह दिल्ली तथा मुम्बई रेल लाइन के
बीचों बीच पड़ता है. मेरे नाम के आगे रतलामी पड़ने का कारण यह है कि याहू में
रजिस्टर करते समय यही उपलब्ध आईडी नाम सूझ पड़ा था, तो अब यह चल पड़ा है.
रतलाम एक छोटा सा शहर है, जिसकी जनसंख्या ३ लाख के करीब है. यहाँ कोई विशेष
दर्शनीय स्थान नहीं है, जिसके कारण यह प्रसिद्ध हो सके. हालाकि यहाँ के नमकीन सेव
काफ़ी प्रसिद्ध हैं, जो कि मिर्च मसाले और फ़ैट से भरपूर होते हैं, ज़ाहिर है,
यहाँ हृदय रोगियों की संख्या भी अनुपात में ज्यादा है. लोग कहते हैं कि यहाँ का
सोना (नींद नहीं) भी बहुत अच्छा होता है. अपने को तो सोना (नींद सम्मिलित) नसीब
ही नहीं है, अपुन क्या जानें सोने का स्वाद...
****

कल दिन भर इंडलिनक्स की बहुभाषी, जीवंत, बूटेबल सीडी का परीक्षण चलता रहा. सीडी
से सीधे ही आप हिंदी, बंगाली, गुज़राती, पंजाबी, तमिल, मलयालम (अंग्रेजी सहित)
इत्यादि भाषा में लिनक्स में बूट कर सकते हैं तथा सीधे ही उस भाषा में कार्य कर
सकते हैं. अभी इसका बीटा संस्करण जारी हुआ है जो थोड़ा सा बगी है, और अनुवाद
अशुद्धियों के साथ है. पर शीघ्र ही इसका पूर्ण संस्करण आएगा जिससे भारतीय
कम्प्यूटिंग को एक नई
दिशा मिलेगी.

रंगोली बीटा संस्करण का अईएसओ इमेज़ यहाँ उपलब्ध हैः
http://www.indlinux.org
****

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